हरिद्वार समाचार– जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि संतों के सानिध्य में ही समाज व राष्ट्र का कल्याण संभव है। भूपतवाला स्थित भागीरथी नगर में श्री आत्मयोग निकेतन धाम आश्रम में आयोजित संत सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानंद सरस्वती महाराज एक दिव्य महापुरूष थे। उनके द्वारा स्थापित श्री आत्मयोग निकेतन धाम आश्रम योग शिक्षा व सेवा का प्रमुख केंद्र बनेगा। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरी महाराज ने कहा कि ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानन्द सरस्वती महाराज संत समाज के प्रेरणा स्रोत थे। ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानन्द सरस्वती महाराज के दिव्य आशीर्वाद एवं महामण्डलेश्वर आचार्य स्वामी महेशानंद सरस्वती महाराज की सद्प्रेरणा से उनकी परम शिष्या महामण्डलेश्वर साध्वी स्वामी संतोषानंद सरस्वती महाराज के सानिध्य में भव्य रूप से निर्मित श्री आत्मयोग निकेतन धाम आश्रम कुंभ मेले में देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं को योग की शिक्षा प्रदान करने के साथ आश्रय का केंद्र भी बनेगा। मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत रविन्द्रपुरी महाराज ने कहा कि धर्मनगरी हरिद्वार में वर्ष भर होने वाले स्नान पर्वो व कुंभ तथा अर्द्ध कुंभ के दौरान आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को आवास सुविधा उपलब्ध कराने में संत समाज का महत्वपूर्ण योगदान है। महामण्डलेश्वर साध्वी स्वामी संतोषानंद सरस्वती महाराज के सानिध्य में श्री आत्म योग निकेतन धाम आश्रम भी संतों व श्रद्धालुओं को आश्रय उपलब्ध कराने के साथ सेवा का बड़े केंद्र के रूप में स्थापित होगा। महामण्डलेश्वर साध्वी स्वामी संतोषानंद सरस्वती महाराज ने सभी संत महापुरूषों का स्वागत करते हुए कहा कि संत महापुरूषों ने सदैव समाज को नई राह दिखायी है। सद्गुरूदेव ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानन्द सरस्वती महाराज ने समाज का मार्गदर्शन करने साथ सेवा प्रकल्पों का संचालन कर गरीब असहायों की सेवा करने में योगदान दिया है। उन्हीं के आशीर्वाद व म.म.महेशानंद सरस्वती महाराज की प्रेरणा से भव्य रूप से अस्तित्व में आए श्री आत्म योग निकेतन धाम को सेवा का प्रमुख केंद्र बनाया जाएगा। महंत देवानंद सरस्वती महाराज ने कार्यक्रम में पधारे सभी संत महापुरूषों का फूलमाला पहनाकर स्वागत किया। इस दौरान श्रीमहंत रामरतन गिरी, श्रीमहंत लखन गिरी, महंत मनीष भारती, महंत दिनेश गिरी, महंत नरेश गिरी, महंत नीलकंठ गिरी, दिगंबर गंगा गिरी, दिगंबर बलवीर पुरी, दिगंबर आशुतोष पुरी, स्वामी मधुर वन, स्वामी रवि वन, स्वामी रघु वन आदि उपस्थित रहे।

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